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संपादकीय ! मोबाइल की गिरफ्त में जिंदगी: सुविधा कब बन गई लत?

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विकाश गुप्ता, प्रधान संपादक, बिहार की बात

मोबाइल आज हमारी जिंदगी का ऐसा हिस्सा बन चुका है, जिसके बिना दिन की शुरुआत और रात का अंत अधूरा लगने लगा है। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल की स्क्रीन देखना, दिनभर बार-बार संदेश और सूचनाएं जांचना तथा रात में देर तक वीडियो देखते रहना आधुनिक जीवन की आम आदत बनती जा रही है। जिस मोबाइल को हमारी सुविधा, जानकारी और संवाद का माध्यम बनना था, वही धीरे-धीरे कई लोगों के समय, एकाग्रता और पारिवारिक रिश्तों पर हावी होता जा रहा है। सवाल मोबाइल के इस्तेमाल का नहीं, बल्कि उस पर बढ़ती निर्भरता का है। आज घरों में एक विचित्र स्थिति दिखाई देती है। परिवार के सदस्य एक ही कमरे में बैठे होते हैं, लेकिन बातचीत के बजाय हर कोई अपनी-अपनी स्क्रीन में खोया रहता है।

आज के अखबार में प्रकाशित

बच्चों के पास माता-पिता के लिए समय कम है, माता-पिता के पास बच्चों की बातें सुनने का धैर्य घट रहा है और रिश्तों में आमने-सामने संवाद की जगह डिजिटल संदेश लेते जा रहे हैं। तकनीक ने दूर बैठे लोगों को करीब जरूर किया है, लेकिन कई बार पास बैठे लोगों के बीच दूरी भी बढ़ा दी है। यह बदलाव केवल आदत का नहीं, सामाजिक जीवन की गुणवत्ता का भी सवाल है। मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों और किशोरों के लिए विशेष चिंता का विषय है। पढ़ाई के समय लगातार सूचनाएं आना, ऑनलाइन खेलों में घंटों बिताना और छोटे-छोटे वीडियो देखते रहने की आदत उनकी एकाग्रता तथा समय प्रबंधन को प्रभावित कर सकती है। देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद का समय भी बिगड़ सकता है। हालांकि हर मोबाइल उपयोग को लत कहना उचित नहीं, लेकिन जब कोई व्यक्ति मोबाइल के बिना बेचैनी महसूस करे, अपने जरूरी काम छोड़ दे या पढ़ाई, नींद और रिश्तों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के बावजूद इस्तेमाल कम न कर पाए, तो इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। इस समस्या के लिए केवल बच्चों को दोष देना भी उचित नहीं होगा।

घर में बड़े लोग स्वयं यदि हर समय मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों से संयम की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? बच्चे अक्सर वही व्यवहार सीखते हैं, जो वे अपने आसपास देखते हैं। इसलिए डिजिटल अनुशासन की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए। भोजन के समय मोबाइल अलग रखना, सोने से पहले स्क्रीन से दूरी बनाना, बच्चों के साथ समय बिताना और खेलकूद तथा पुस्तक पढ़ने जैसी गतिविधियों को प्रोत्साहित करना उपयोगी कदम हो सकते हैं। शिक्षण संस्थानों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। विद्यार्थियों को मोबाइल के लाभ और नुकसान, ऑनलाइन सुरक्षा, साइबर धोखाधड़ी तथा भ्रामक सूचनाओं की पहचान के बारे में जागरूक करना चाहिए। मोबाइल को पूरी तरह दुश्मन मानने के बजाय उसका जिम्मेदार उपयोग सिखाना अधिक व्यावहारिक रास्ता है। इसी तरह अभिभावकों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर संवेदनशील निगरानी रखनी चाहिए, लेकिन संवाद और विश्वास की जगह केवल प्रतिबंधों को नहीं देना चाहिए। मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल का असर केवल समय की बर्बादी तक सीमित नहीं है।

लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में थकान, शारीरिक गतिविधियों में कमी और दिनचर्या में असंतुलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की जिंदगी से लगातार तुलना करना भी कुछ लोगों में तनाव और हीनभावना बढ़ा सकता है। ऐसे में जरूरी है कि व्यक्ति अपने इस्तेमाल पर ध्यान दे, अनावश्यक सूचनाएं बंद करे, नियमित अंतराल पर स्क्रीन से विराम ले और वास्तविक जीवन की गतिविधियों के लिए समय तय करे। यह भी समझना होगा कि मोबाइल ने शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, पत्रकारिता और सरकारी सेवाओं तक पहुंच आसान बनाई है। आपातकाल में संपर्क से लेकर नई जानकारी हासिल करने तक इसकी उपयोगिता निर्विवाद है। इसलिए समाधान तकनीक से दूरी बनाने में नहीं, बल्कि उसे अपने नियंत्रण में रखने में है। मोबाइल हमारा सहायक बने, हमारी दिनचर्या का मालिक नहीं।

आज जरूरत एक छोटे, लेकिन महत्वपूर्ण संकल्प की है—हर खाली पल में मोबाइल उठाने के बजाय कुछ समय खुद के लिए, परिवार के लिए और समाज के लिए निकालें। बच्चों को मैदान से जोड़ें, युवाओं को किताबों और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करें और परिवार में बातचीत की परंपरा को फिर मजबूत बनाएं। यदि मोबाइल के कारण नींद, पढ़ाई, काम या रिश्ते लगातार प्रभावित हो रहे हों और इस्तेमाल पर नियंत्रण कठिन लग रहा हो, तो परिवार के सहयोग के साथ जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह भी लेनी चाहिए। अंततः मोबाइल की असली ताकत उसकी तकनीक में नहीं, बल्कि इस बात में है कि हम उसका उपयोग किस उद्देश्य से करते हैं। स्क्रीन पर बिताया गया हर मिनट गलत नहीं, लेकिन जिंदगी के जरूरी पल यदि उसी स्क्रीन में खोने लगें, तो ठहरकर सोचने की आवश्यकता है। तकनीक का विकास तभी सार्थक है, जब वह इंसान को अधिक सक्षम बनाए, न कि उसे अपने ही जीवन से दूर कर दे। मोबाइल हाथ में रहे, दिमाग पर नहीं; संवाद बढ़ाए, रिश्ते न घटाए। यही डिजिटल युग में समझदारी की असली पहचान है।

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