विकाश गुप्ता, प्रधान संपादक, बिहार की बात (अखबार)
…..जिस उम्र में युवाओं के हाथों में किताबें होनी चाहिए, आंखों में सुनहरे सपने और मन में अपना भविष्य संवारने का संकल्प होना चाहिए, उस उम्र में कुछ नौजवान अपराध की अंधेरी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं। जिस उम्र में उन्हें अपने माता-पिता के संघर्षों का सहारा बनना चाहिए, उसी उम्र में वे हथियार, नशा और अपराध को अपनी पहचान बनाने लगे हैं।
यह केवल किसी एक परिवार की चिंता नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य के लिए गंभीर चेतावनी है। नशे की लत, स्मैक जैसे मादक पदार्थों का सेवन तथा अपराधियों के बहकावे में आकर चंद रुपयों के लिए हत्या जैसे जघन्य अपराध करना युवा पीढ़ी के सामने खड़े खतरनाक संकट को उजागर करता है। सवाल यह है कि आखिर हमारे नौजवान किस दिशा में जा रहे हैं? क्या चंद रुपयों के लिए किसी की जान लेना इतना आसान हो गया है कि अपराध करने से पहले एक पल के लिए भी अपने परिवार, अपने भविष्य और उस मां के आंचल का ख्याल नहीं आता, जिसने अपनी संतान को पालने में पूरी जिंदगी लगा दी? जिस पिता ने अपनी मेहनत की कमाई से बेटे की पढ़ाई और बेहतर भविष्य के सपने देखे, क्या उसने कभी कल्पना की होगी कि एक दिन वही बेटा अपराध की दुनिया में अपना नाम बना लेगा? जिस मां ने अपने बच्चे को उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उसी के बुढ़ापे का सहारा आज जेल की सलाखों के पीछे पहुंच सकता है।
यह विडंबना ही नहीं, सामाजिक चेतना के लिए एक गंभीर चुनौती है। अपराध की दुनिया युवाओं को रातोंरात अमीर बनने, रौब जमाने और बिना मेहनत के पैसा कमाने का झूठा सपना दिखाती है। कुछ आपराधिक तत्व बेरोजगार और भटके हुए युवाओं को पैसों का लालच देकर अपने जाल में फंसाते हैं। शुरुआत में मामूली काम, फिर धमकी, मारपीट और अंततः हत्या जैसे गंभीर अपराधों तक पहुंचने का रास्ता तैयार किया जाता है। युवा यह समझ नहीं पाते कि जिन लोगों के इशारे पर वे अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं, वे संकट के समय उनका साथ देने के बजाय उनसे किनारा कर सकते हैं।
चंद रुपयों के लिए किसी की हत्या कर देने वाला युवक यह भूल जाता है कि अपराध के बाद न पैसा स्थायी रहता है, न रुतबा और न ही आजादी। पीछे रह जाता है एक उजड़ा हुआ परिवार, पीड़ित परिजनों का दर्द और अपनी पूरी जिंदगी को अंधकार में धकेल देने वाला पछतावा। इस समस्या का एक गंभीर पहलू नशे का बढ़ता आकर्षण है। स्मैक और अन्य नशीले पदार्थों की गिरफ्त में आने के बाद कुछ युवा अपनी पढ़ाई, परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों से दूर होने लगते हैं। नशे की लत आर्थिक संकट पैदा कर सकती है और कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को गलत संगत तथा अपराध की ओर भी धकेल सकती है। हालांकि हर नशा करने वाला व्यक्ति अपराधी नहीं होता,
लेकिन युवाओं को नशे से बचाना और इसकी लत से जूझ रहे लोगों को समय पर उपचार एवं परामर्श उपलब्ध कराना समाज और प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। नशे के कारोबार में शामिल लोगों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई के साथ-साथ युवाओं को इस दलदल से बाहर निकालने के लिए प्रभावी प्रयास भी जरूरी हैं। इस समस्या के लिए केवल पुलिस और प्रशासन को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हुआ जा सकता। परिवार, विद्यालय, महाविद्यालय और समाज—सभी को आत्ममंथन करना होगा। बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव, गलत संगत, पढ़ाई से दूरी, नशे की आशंका या संदिग्ध गतिविधियों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। अभिभावकों को अपने बच्चों के साथ संवाद बनाए रखना होगा। उन्हें केवल डांटने या नियंत्रित करने के बजाय उनकी परेशानियों को समझना होगा। वहीं, शिक्षण संस्थानों को किताबी शिक्षा के साथ नैतिक मूल्यों, जिम्मेदारी, अनुशासन और जीवन कौशल पर भी ध्यान देना चाहिए। युवाओं को खेल, रोजगारपरक प्रशिक्षण, सांस्कृतिक गतिविधियों और सकारात्मक सामाजिक कार्यों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। प्रशासन की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। नशीले पदार्थों की आपूर्ति और बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण, अपराधियों के नेटवर्क की पहचान, युवाओं को लालच देकर अपराध कराने वालों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई तथा संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित निगरानी आवश्यक है। साथ ही, बेरोजगार युवाओं के लिए कौशल विकास, रोजगार के अवसर और नशामुक्ति सेवाओं की उपलब्धता बढ़ानी होगी। अपराध करने वाले को कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए, लेकिन अपराध की ओर बढ़ रहे युवाओं को समय रहते रोकना और उन्हें सही रास्ते पर लाना भी उतना ही जरूरी है। समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। हथियार लहराने, धमकी देने, दबंगई दिखाने और अपराध के जरिए पैसा कमाने वाले व्यक्ति को प्रभावशाली समझना बंद करना होगा। जब समाज अपराधी के भय को उसकी ताकत और उसके अवैध धन को उसकी सफलता मानने लगता है, तब अनजाने में अपराध को बढ़ावा मिलता है।
वास्तविक सम्मान उस युवा का होना चाहिए, जो कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदारी से पढ़ाई करता है, मेहनत करके परिवार का सहारा बनता है और अपने ज्ञान तथा प्रतिभा से समाज को आगे बढ़ाता है। युवाओं को भी यह समझना होगा कि जवानी जीवन बनाने का सबसे महत्वपूर्ण समय है, उसे बर्बाद करने का नहीं। आज लिया गया एक गलत फैसला आने वाले कई वर्षों को अंधकारमय बना सकता है। किसी के बहकावे में आकर उठाया गया एक हथियार किसी निर्दोष परिवार की दुनिया उजाड़ सकता है और अपराध करने वाले युवक के अपने परिवार को भी जीवन भर के दुख में डाल सकता है।

इसलिए किसी भी लालच, धमकी या दबाव में आकर अपराध का रास्ता चुनना अपने भविष्य के साथ-साथ दूसरों के जीवन से भी खिलवाड़ करना है। बिहार की बात का स्पष्ट मानना है कि युवाओं को अपराधी बनने से रोकना केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और भविष्य की सुरक्षा का सवाल है। हमें ऐसी पीढ़ी तैयार करनी है, जो नशे में नहीं, ज्ञान में अपनी ताकत खोजे; हथियार में नहीं, हुनर में अपना भविष्य देखे; और अपराध के रास्ते नहीं, मेहनत तथा ईमानदारी के सहारे अपनी पहचान बनाए। समय रहते यदि परिवार, समाज और प्रशासन ने मिलकर ठोस कदम नहीं उठाए, तो इसका खामियाजा आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ सकता है। याद रखिए, अपराध की दुनिया में प्रवेश करना आसान हो सकता है, लेकिन उससे निकलने की कीमत कई बार पूरी जिंदगी चुकानी पड़ती है। कलम पकड़ने वाले हाथों को हथियार उठाने से रोकना ही आज की सबसे बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी है।




